निम गोरिया क्षेत्रपाल भीनमाल

भीनमाल के स्वर्णिम इतिहास और वर्तमान की कड़ियों को जोड़ने के क्रम में आज बात करते है भीनमाल शहर के रक्षक निम गोरिया #भैरव देव (खेतलाजी / क्षेत्रपाल) मंदिर की। 

भीनमाल (#Bhinmal) के क्षेत्रपाल (खेतलाजी) का मंदिर नगर के सुविख्यात #जाकोब तालाब (जय कूप सरोवर /यक्ष सरोवर) के दक्षिण में स्थित है। 

शहर के रक्षक - याने #क्षेत्रपाल #यक्ष और क्षेत्रीय बोलचाल की भाषा में खेतला जी श्री नीमगोरिया भैरव का मूल मंदिर विक्रम संवत 1425 (ईस्वी सन् 1369) में बना था ऐसा यहाँ प्राप्त शिलालेख से प्रमाणित होता है। जन श्रुति के अनुसार #खेतलाजी /निमगोरिया भैरव की प्रतिमा जाकोब तालाब की खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी।

इस मंदिर में निम गोरिया भैरव देव की मूर्ति एक स्तम्भ के रूप में हैं। जिसके चारों तरफ चार अलग अलग दैवीय छवि उकेरी हुई हैं। इनमे से एक छवि/प्रतिमा श्री नीमगोरिया भैरव क्षेत्रपाल (खेतला जी), दूसरी शक्ति की दैवी #क्षेमंकरी माताजी त्रिशूल रूप में, तीसरा #नाग-नागिन का जोड़ा और चौथे श्री #हनुमान जी हैं । 

इस मंदिर में वर्तमान में एक पंच-लिंगी #शिव भी बिराजित हैं। जिनमे से चार शिवलिंग चारों दिशाओं में है और पांचवा शिवलिंग आकाश मुखी है। लगभग 45 वर्ष पूर्व यह #पंचमुखी #शिवलिंग इस मंदिर से थोड़ी दुरी पर स्थापित था। जो अब इसी क्षेत्रपाल मंदिर का ही हिस्सा है। इस पंचमुखी शिवलिंग को कई लोग चार मुखी समझ लेते है क्योंकि चार शिवलिंग आसानी से दर्शित होते है। जबकि पांचवा शिवलिंग आकाश मुखी होने से ध्यान पूर्वक देखने से ही दर्शित होता है। 

भीनमाल के गौरवमय इतिहास से साक्षात्कार करवाने वाले महत्वपूर्ण ग्रन्थ #श्रीमाल #पुराण में इस पंचमुखी #शिवलिंग वाले मंदिर का जो विवरण प्राप्त होता है। उसके अनुसार यह शिवलिंग तत्कालीन समय में कश्यपेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता था। यहाँ कश्यप नामक ऋषि का आश्रम था और उन्ही के द्वारा महादेव की घोर तपस्या करने से यह पंच मुखी शिवलिंग पाताल से प्रगट हुआ था। ऋषि द्वारा पूजित होने से इसका नाम #कश्यपेश्वर महादेव था। 
(संदर्भ - श्रीमाल महात्मय - स्कन्द पुराण, तृतीय परिच्छेद, 23वां अध्याय)

वर्तमान में पुराने जीर्ण मंदिर की जगह नया सुन्दर #मंदिर बन कर तैयार है। मंदिर की देख-रेख कर रहे ट्रस्ट मंडल द्वारा आगामी 29 अप्रैल 2016 को नूतन मंदिर की हिन्दू विधिविधान से प्रतिष्ठा का कार्यक्रम था। दानदाता श्री सुखराज बाबूलालजी नाहर द्वारा नूतन मंदिर का मुख्य द्वार बनवाया गया है तथा प्रतिष्ठा के दिन फले-चुनड़ी (36 कौम का सामूहिक भोज) आयोजन का लाभ भी उन्होंने लिया है। 

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