कोट कास्ता दुर्ग पुरी जानकारी
भीनमाल से 15 किमी दूर कोटकास्ता किला
जालोर जिले के भीनमाल कस्बे से 15 किलोमीटर दूर स्थित कोटकास्ता गांव में बना हुआ है
कोट गांव पहले परकोटे के अंदर बसा हुआ था। गांव में आने जाने के लिए दो अलग-अलग गेट बने हुए थे। गेट पर 24 घंटे पहरेदार पहरा देते थे। परकोटे के बाहर कस्तान गांव बसा हुआ था। अब आबादी बढ़ने के कोट और कस्तान एक हो गए और कोटकास्ता गांव से पहचाने जाने लगा।
'द वॉरियर्स' की शूटिंग के बाद आया चर्चा में
यह किला उस समय देशभर की सुर्खियां बना जब इसमें हॉलीवुड फिल्म 'द वॉरियर्स' की शूटिंग की गई थी। इसके बाद यह किला एक बार फिर चर्चाओं में आया था, लेकिन कुछ दिन बाद ही चर्चाएं समाप्त हो गई और किला तब से लेकर अब तक अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।
फिल्म कि कुछ तस्वीरें
यह ऐतिहासिक दुर्ग बिना देखरेख के खंडहर में तब्दील हो गया है। लंबे समय से क्षेत्रवासियों की मांग चल रही है कि इस किले का जीर्णोद्धार करके यहां पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए ।
इतिहास, सती के श्राप के बाद किला हुआ वीरान जानकारों की मानें तो कोटकास्ता के जागीरदार बाद में जनता पर अत्याचार करने लगे एक महिला ने अत्याचार से परेशान होकर किले से कूदकर आत्महत्या कर ली. उसने तत्कालीन जागीरदार को श्राप दिया कि तेरी वंश रेखा आगे नहीं बढ़ेगी. यही वजह है कि यहां ठिकाना वंशहीन हो गया.
जोधपुर रियासत के महाराज मान सिंह।
जिन्होंने 19 अक्टूबर 1803 - 4 सितंबर 1843 तक शासन किया। 7 नवंबर 1791 को उनके दादा विजय सिंह द्वारा उन्हें वारिस के रूप में नियुक्त किया गया था। हालांकि, विजय सिंह की मृत्यु के बाद, भीम सिंह ने जोधपुर पर कब्जा किया
राज्यासीन होते ही उसने अपने भाई - भतीजों को मरवाना आरंभ कर दिया । राजकुमार मानसिंह ने अपने प्राणों की रक्षा के लिये जालोर के दुर्ग में शरण ली । और स्वयं को मारवाड़ का शासक घोषित कर दिया । भीमसिंह की सेना ने 10 वर्ष तक जालोर दुर्ग को घेरे रखा किंतु मानसिंह पकड़ा नहीं जा सका । जब मानसिंह को जोधपुर की सेना से बचने का कोई उपाय न दिखा तो उसने 15 अक्टूबर 1803 को जालोर दुर्ग छोड़ने का विचार किया ।
जलन्धरनाथ पीठ के योगी आयस देवनाथ ने यह सुना तो उसने मानसिंह से केवल 4-5 दिन और जालोर का किला न छोड़ने का आग्रह किया और कहा कि यदि 21 अक्टूबर तक किला नहीं छोड़ोगे तो मारवाड़ का राज्य तुम्हें मिल जायेगा ।
आयस देवनाथ ने भविष्यवाणी की कि वह दुर्ग ना छोड़े तीन दिन बाद उन्हें जोधपुर का राज्य मिलेगा वास्तव में ऐसा ही हुआ , जोधपुर के शासक भीम सिंह जी की अचानक मौत हो गई और जोधपुर का राज्य सिंहासन मानसिंह जी को प्राप्त हुआ महाराजा मानसिंह जी मेधावी और विद्याव्यसनी तो थे ही उन्हें नाथ दर्शन को आत्मसात करते देर ना लगी और उनकी आस्था नाथ सम्प्रदाय में दृढ़ से दृढ़तर होती गई । जोधपुर नरेश बनने पर महाराजा मानसिंह जी ने आयस देवनाथ जी को बन्धु बान्धवों सहित जोधपुर बुला लिया । देवनाथ जी के जोधपुर पहुंचने पर महाराजा मानसिंह जी ने उनकी अगवानी करके हाथी पर विराजमान कर जोधपुर नगर में लाये और उनका भव्य स्वागत अभिनन्दन किया । मानसिंह जी ने देवनाथ जी को विधिपूर्वक राजगुरु के पद पर आसीन किया और उस दिन से नाथ सम्प्रदाय को मारवाड़ का राजधर्म घोषित किया । राजगुरु देवनाथ जी और उनके भाइयों हर नाथ जी . सुरत नाथ जी भीमनाथ जी व ओमनाथ जी को राज्य में समृद्ध जागीरें प्रदान की गई ।
जोधपुर नरेश मानसिंह जी ने आज्ञा जारी करी कि मारवाड़ के हरेक परगने में कम से कम एक नाथ मठ ( आसन ) अवश्य बनाया जाये । महाराजा मानसिंह जी के आदेशानुसार राजकीय पत्रों में सर्वोपरि " जालंधर नाथ छै " लिखा जाने लगा । से आयस देवनाथ जी और उनके परिवार को अन्यत्र व्यवस्था न होने के कारण सूरसागर के महलों में ठहराया गया . किन्तु मानसिंह जी अपने गुरु की प्रतिष्ठा और स्वयं की गरिमा के अनुरूप एक भव्य आवास स्थल भेंट करना चाहते थे अतः उन्होंने नाथ जी के निवास ( रहने ) के लिए 9 अप्रैल 1804 ईस्वी से नागौरी गेट के बाहर से निर्माण कार्य शुरू किया , जो कि 04 फरवरी 1805 को बनकर पूर्ण हुआ । इसे महामंदिर " नाम प्रदान किया ।
महामंदिर में बनी छतरी पर से देवनाथ जी प्रतिदिन अपने शिष्य महाराजा मानसिंह जी को दर्शन दिया करते थे । महाराजा गुरु नाथ जी के दर्शन के पश्चात ही अन्न जल ग्रहण किया करते थे । महामंदिर क्षेत्र में ही एक सरोवर बनवाया गया , जिसका नामकरण महाराजा ने स्वयं के नाम पर मान सरोवर किया । इस सरोवर में महाराजा मानसिंह जी और राजगुरु देवनाथ जी नौका विहार किया करते थे । महामंदिर में ही मानसिंह जी अपने - अपने गुरुदेव के लिए सबसे उत्तम जालंधर नाथ जी का निज मंदिर बनवाया । निज मंदिर में संगमरमर पर बनें विशाल सिंहासन पर जालंधर नाथ जी की मूर्ति विराजमान हैं । निज मंदिर को वि . स . 1861 की माघ शुक्ल पंचमी ( 04 फरवरी 1805 ) को सर्व साधारण के लिए खोल दिया गया । स्वयं जोधपुराधिपति मानसिंह जी ने प्रत्येक सोमवार को इस मन्दिर में दर्शनार्थ पधारते थे ।
उनके भाइयों हर नाथ जी . सुरत नाथ जी भीमनाथ जी व ओमनाथ जी को राज्य में समृद्ध जागीरें प्रदान की गई
मान सिंह जी ने नाथों को अनेकों जागीरें भी प्रदान की। योगी भीमनाथ को भी कास्तान सहित 9 गांव जागीरी दी गई। भीमनाथ आईजी महाराज के नाम से प्रसिद्ध थे तथा उन्होंने कास्ता गांव के पास ही पहाड़ी पर एक लघु दुर्ग का निर्माण करवाया तथा उसके चारों ओर एक मजबूत परकोटा बनवाया। इस परकोटे के निर्माण में पहाड़ी को भी दीवार की भांति प्रयुक्त जारी किया गया।दुर्ग के परकोटे के बहार एक ओर विशाल दरवाजे एवं दो छोटे छोटे दरवाजे बनवाए गए। इस प्रकार कास्ता गांव की बगल में कोट नाम से दूसरा गांव बस गया। परकोटे के भीतर का गांव कोट बहार का गांव कास्ता तथा सम्मिलित रूप से कोटकास्तान कहलाने लगा। लगभग 200 वर्ष पुराने नाथों के इस दुर्ग में तीन मंजिला राजमहल, प्राचीर, बुर्ज, विशाल प्रवेश द्वार तथा अन्य निर्माण अब भी देखे जा सकते है। भीतरी भाग में प्रासाद के दोनों ओर ऊंचे व बड़े चबूतरे बने हुए है। प्रसाद के मुख्य द्वार पर काठ का एक जीर्णशीर्ण किन्तु विशाल दरवाजा है ,जो भीतर से बन्द है। चूंकी यह प्रासाद तीन मंजिला है। जिसके दालान, चौबारे, कक्ष, गवाक्ष, झरोखे बनते है।
जेसे क़िले व महल पर राजा का हक था वही महामंदिर स्वतंत्र था । इस क्षेत्र मे नाथजी के नियन चलते थे । बस इसी स्वतन्त्रता ने भीमनाथ को नवरोज़ा लेने का चस्का लगा दिया ( नवरोज़ा पराई स्त्री को अपने हरम मे बुलाना होता हे कुछ दिनो के लिए ) ठीक ये घटना कोटकास्तागाँव की है । कहा जाता है कि जो बारात दुर्ग के आगे से जाती थी उस नव विवाहित युवती को कुछ दिनों के लिए दुर्ग में रहना पड़ता था । एक बार मुड़तरा सिली के कन्या का विवाह पड़ोस के गाँव पादरा मे युवक के साथ होना तय हुआ था।
जब वहां बारात दुर्ग के आगे पहुंची किले के पहरेदारों ने रूकवाया और नवरोज़ा कि बात कही क़िले में प्रवेश पाना आपजन के लिए उस समय सरल नहि था लोग घबरा गये ओर बातें करने लगे । " ये तो रोज़ की बात हे होता है ये । " " नाथजी का आदेश हे ओ तो ।
जब युवती को किले के अन्दर ले जा रहे थे तब
कन्या ने परकोट के गेट पर हाथ रखकर कहा कि
जातो री पुट देख लो आदतों रो मुडो नहीं देखो सको
वह नवविवाहित कन्या उसे क़िले में ले जाकर . नाथ के महल में पहुँचा दिया गया । जब नाथजी की कुद्रिसटी का शिकार होना का समय आया तो तब कन्या ने नाथजी को श्राप दिया की " तुम मुझे स्पर्श भी नहि कर सकते । तेरा ओर इस क़िले का सर्वनाश जो जायेगा । " यह बोल कर वह क़िले की दीवार से कूद पड़ी ।
उसने तत्कालीन जागीरदार को श्राप दिया की तेरा वंश आगे नहीं बढ़ेगा। यही वजह है कि स्थान वंशहीन हो गया। वर्तमान में किले की देखरेख दिलीपचन्द्र नाथ के पुत्र योगेशनाथ कर रहे है।